Tik Tok वीडियो सुरक्षा के लिए खतरा, अफवाहों को तेजी से फैलता है

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भोपाल, राजधानी के युवा वैश्विक महामारी में फ़ैल रही अफवाहों के लिए जिम्मेदार चीन को मान रहे है, उनका कहना है की Tik- Tok पर आने वाले वीडियो सुरक्षा के लिए खतरा है, तेजी से अफवाह फैलाती है जिससे कई बार हानि हो रही है, समाज प्रदूषित हो रहा है Tik Tok को बैन करवाने हेतु मप्र हाईकोर्ट में याचिका दायर करने जा रहे हैं, श्रीकांत विश्वकर्मा ने बताया है की भारत में इस समय शॉर्ट वीडियो एप टिक टॉक का जादू लोगों के सिर चढ़कर बोल रहा है. ये एप केवल फूहड़ता एवं अश्लीलता फैलता है, इस एप के पीछे इस कदर पागल हैं कि कोई अपनी जान तो कोई अपनी नौकरी दांव पर लगा दे रहा है. टिक-टॉक एप से परिवार बिखर रहे है. कई तलाक के मामले जिसमें पति-पत्नी ने एक दुसरे से मोबाइल को दूर रखने के लिए गुहार लगाई है. पति-पत्नी के वीडियो पर आने वाले कमेंट्स की वजह से उनका जीना मुहाल हो गया है, विवाद होने लगा. बावजूद लोग टिक टॉक वीडियो बनाना नहीं छोड़ रहे हैं.

 

जानें क्‍या है Tik tok के साइड इफेक्ट ?

टिकटॉक से यूजर लिप-सिंक और पॉपुलर गानों पर डांस करते हैं, जो काफी वायरल होते हैं, चीन की मशहूर कंपनी ‘बाइट डान्स’ का टिक टॉक ऐप पर मालिकाना हक़ है, चीनी कंपनी ‘बाइट डान्स’ ने 2017 में ‘टिक-टॉक’ लॉन्च किया था, अक्टूबर 2018 तक अमरीका में सबसे ज़्यादा डाउनलोड किया जाने वाला ऐप बन गया. दुनिया के 154 से ज्यादा देशों में ऐप इस्तेमाल हो रहा है, दुनियाभर में 50 करोड़ से ज्यादा ऐप यूज़र हैं, भारत में भी 18 करोड़ यूज़र हैं, जिनमें लगभग 2 करोड़ ऐक्टिव यूज़र हैं चीन में 15 करोड़ लोग रोज़ाना इस्तेमाल करते हैं.

यूजर पंकज गजभिये ने बताया की वैसे तो इसे 13 साल से ज़्यादा उम्र के लोग ही इस्तेमाल कर सकते हैं. भारत समेत दुनिया के तमाम देशों में टिक-टॉक के जरिए जो वीडियो बनाए जाते हैं उसमें एक बड़ी संख्या 13 साल से कम उम्र के लोगों की है. प्राइवेसी के लिहाज़ से टिक-टॉक ख़तरों से खाली नहीं है. क्योंकि इसमें सिर्फ़ दो प्राइवेसी सेटिंग की जा सकती है- ‘पब्लिक’ और ‘ओनली’. आप वीडियो देखने वालों में कोई फ़िल्टर नहीं लगा सकते. या तो आपके वीडियो सिर्फ़ आप देख सकेंगे या फिर हर वो शख़्स जिसके पास इंटरनेट है.

अगर कोई यूज़र अपना टिक-टॉक अकाउंट डिलीट करना चाहता है तो वो ख़ुद से ऐसा नहीं कर सकता. इसके लिए उसे टिक-टॉक से रिक्वेस्ट करनी पड़ती है. चूंकि ये पूरी तरह सार्वजनिक है इसलिए कोई भी किसी को भी फ़ॉलो कर सकता है, मेसेज कर सकता है. ऐसे में कोई आपराधिक या असामाजिक प्रवृत्ति के लोग छोटी उम्र के बच्चे या किशोरों को आसानी से गुमराह कर सकते हैं. फ़ेक न्यूज़ इस एप से तेज़ी से फल-फूल रहा है उसे देखते हुए भी टिक-टॉक जैसे ऐप्लीकेशन्स पर लगाम लगाने की ज़रूरत है.

कई टिक-टॉक अकाउंट अडल्ट कॉन्टेंट से भरे पड़े हैं और चूंकि इनमें कोई फ़िल्टर नहीं है, हर टिक-टॉक यूज़र इन्हें देख सकता है, यहां तक कि बच्चे भी. सबसे बड़ी दिक़्कत ये है कि इसमें किसी कॉन्टेन्ट को ‘रिपोर्ट’ या ‘फ़्लैग’ का कोई विकल्प नहीं है. ये सुरक्षा और निजता के लिहाज़ से ख़तरनाक तो हो सकता है. ‘साइबर बुलिंग’ भी बड़ी समस्या है. साइबर बुलिंग यानी इंटरनेट पर लोगों का मज़ाक उड़ाना, उन्हें नीचा दिखाना, बुरा-भला कहना और ट्रोल करना. हम जब कोई ऐप डाउनलोड करते हैं तो प्राइवेसी की शर्तों पर ज़्यादा ध्यान नहीं देते. बस ‘यस’ और ‘अलाउ’ पर टिक करते चले जाते हैं. हम अपनी फ़ोटो गैलरी, लोकेशन और कॉन्टैक्ट नंबर इन सबका एक्सेस दे देते हैं. इसके बाद हमारा डेटा कहां जा रहा , इसका क्या इस्तेमाल हो रहा है , हमें कुछ पता नहीं चलता.”

ज़्यादातर ऐप्स ‘आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस’ की मदद से काम करते हैं. ऐसे में अगर आप इन्हें एक बार भी इस्तेमाल करते हैं तो ये आपसे जुड़ी कई जानकारियां अपने पास हमेशा के लिए जुटा लेते हैं इसलिए इन्हें लेकर ज़्यादा सतर्क होने की ज़रूरत है.

इनका कहना है

मैंने तो टिक टॉक को डिलीट भी कर दिया है अपने मोबाइल से मैं बैन का समर्थन करता हूं बायकॉट चाइना
– विजय कुर्मी पटेल

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